सह्याद्रि पर्वतमाला में स्थित भगवान शिव का दिव्य भीमाशंकर स्वरूप
श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के षष्ठ ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रसिद्ध है। यह पवित्र धाम महाराष्ट्र की सह्याद्रि पर्वतमाला में स्थित है। घने वन, पर्वत और प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा यह क्षेत्र प्राचीन काल से शिवभक्तों की तपोभूमि माना जाता है।
शिवपुराण के अनुसार प्राचीन समय में भीम नामक एक अत्यंत बलशाली राक्षस उत्पन्न हुआ। वह रावण के भाई कुंभकर्ण का पुत्र माना जाता था। अपने पिता की मृत्यु का कारण भगवान श्रीराम और देवताओं को मानकर उसने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा जी से महान शक्ति प्राप्त कर ली।
वरदान प्राप्त करने के बाद राक्षस भीम अत्यंत अहंकारी और क्रूर बन गया। उसने देवताओं, ऋषियों और धर्मात्माओं को कष्ट देना आरंभ कर दिया। वह शिवभक्त राजा कामरूपेश्वर और अन्य भक्तों को भी सताने लगा। पूरे क्षेत्र में भय और अत्याचार का वातावरण फैल गया।
एक दिन राक्षस भीम ने शिवभक्त राजा को बंदी बना लिया। तब भी राजा कारागार में भगवान शिव की आराधना करते रहे। राक्षस भीम ने क्रोधित होकर शिवलिंग को नष्ट करने का प्रयास किया। उसी क्षण भगवान शिव तेजस्वी ज्योति के साथ प्रकट हुए।
भगवान शिव और राक्षस भीम के बीच भयंकर युद्ध हुआ। अंततः भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से राक्षस भीम का संहार कर दिया और समस्त भक्तों को भयमुक्त किया। देवताओं और ऋषियों ने भगवान शिव की स्तुति की तथा उनसे उसी स्थान पर सदैव विराजमान रहने की प्रार्थना की।
भगवान शिव भक्तों की प्रार्थना स्वीकार कर वहाँ ज्योतिर्लिंग रूप में स्थापित हो गए और “भीमाशंकर” नाम से प्रसिद्ध हुए। कहा जाता है कि इसी क्षेत्र से भीमा नदी का उद्गम भी हुआ, जो इस स्थान की पवित्रता को और बढ़ाता है।
श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग का दर्शन भक्तों को भय, पाप और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति प्रदान करने वाला माना जाता है। सह्याद्रि पर्वतों की शांत और दिव्य वायु में स्थित यह पवित्र धाम आज भी करोड़ों शिवभक्तों की श्रद्धा का केंद्र है।