नर्मदा तट पर स्थित “ॐ” स्वरूप भगवान शिव का दिव्य धाम
श्री ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के चतुर्थ ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रसिद्ध है। यह पवित्र तीर्थ मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी के तट पर स्थित है। शिवपुराण के अनुसार यह ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के दिव्य “ॐ” स्वरूप का प्रतीक माना जाता है। नर्मदा नदी के मध्य स्थित यह द्वीप ऊपर से देखने पर “ॐ” के आकार जैसा प्रतीत होता है, इसी कारण इसका नाम “ओंकारेश्वर” पड़ा।
प्राचीन काल में विंध्य पर्वत को अपनी महानता और ऊँचाई का अत्यधिक अभिमान हो गया था। देवर्षि नारद ने विंध्य पर्वत से कहा कि मेरु पर्वत उससे अधिक महान और पूजनीय माना जाता है। यह सुनकर विंध्य पर्वत को अत्यंत दुःख हुआ और उसने भगवान शिव की आराधना द्वारा स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने का निश्चय किया।
विंध्य पर्वत नर्मदा तट पर आकर भगवान शिव की कठोर तपस्या करने लगा। उसने मिट्टी का शिवलिंग बनाकर लंबे समय तक “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप किया। उसकी घोर तपस्या और अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए।
भगवान शिव ने विंध्य पर्वत से वर मांगने को कहा। विंध्य ने प्रार्थना की कि भगवान शिव सदैव उस स्थान पर विराजमान रहें और भक्तों का कल्याण करें। भगवान शिव ने उसकी प्रार्थना स्वीकार की और वहाँ ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए।
कहा जाता है कि उसी स्थान पर दो स्वरूप प्रतिष्ठित हुए—एक “ओंकारेश्वर” और दूसरा “ममलेश्वर” या “अमलेश्वर”। दोनों ही स्वरूप भगवान शिव की दिव्य शक्ति और करुणा के प्रतीक माने जाते हैं।
नर्मदा नदी का यह पवित्र क्षेत्र प्राचीन काल से ऋषियों, तपस्वियों और शिवभक्तों की साधना भूमि रहा है। यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता, पर्वत, नदी और मंदिर भक्तों को अद्भुत आध्यात्मिक शांति प्रदान करते हैं।
श्री ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का दर्शन भक्तों को पापों से मुक्ति, मानसिक शांति और शिव कृपा प्रदान करने वाला माना जाता है। यह दिव्य तीर्थ आज भी सनातन धर्म की महान आध्यात्मिक परंपरा का जीवंत प्रतीक है।