भगवान शिव का दिव्य वैद्य स्वरूप और रावण की महान तपस्या
श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के नवम ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रसिद्ध है। इसे बैद्यनाथ धाम भी कहा जाता है। शिवपुराण के अनुसार यह ज्योतिर्लिंग भगवान शिव की करुणा, चिकित्सा शक्ति और भक्तवत्सल स्वरूप का प्रतीक माना जाता है। यह पवित्र धाम शिवभक्तों की आस्था का महान केंद्र है।
प्राचीन काल में लंका के राजा रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अत्यंत कठोर तपस्या आरंभ की। वह भगवान शिव का महान भक्त था और चाहता था कि भगवान शिव सदैव लंका में निवास करें। उसने वर्षों तक घोर तप किया, परंतु जब भगवान शिव प्रसन्न नहीं हुए, तब उसने अपने सिर एक-एक करके अर्पित करने शुरू कर दिए।
कहा जाता है कि रावण ने अपने नौ सिर भगवान शिव को समर्पित कर दिए और जब वह दसवाँ सिर अर्पित करने वाला था, तब भगवान शिव उसकी भक्ति और समर्पण से अत्यंत प्रसन्न हो गए। उन्होंने प्रकट होकर रावण के सभी सिर पुनः जोड़ दिए और उसे दिव्य शक्ति प्रदान की।
भगवान शिव ने रावण से वर मांगने को कहा। रावण ने प्रार्थना की कि भगवान शिव उसके साथ लंका चलें। तब भगवान शिव ने उसे एक दिव्य शिवलिंग प्रदान किया और कहा कि यदि इसे मार्ग में कहीं भूमि पर रख दिया गया, तो यह वहीं स्थिर हो जाएगा।
देवताओं को भय हुआ कि यदि शिवलिंग लंका पहुँच गया तो रावण अत्यंत शक्तिशाली हो जाएगा। इसलिए उन्होंने योजना बनाई। यात्रा के दौरान रावण को संध्या के समय आचमन और विश्राम की आवश्यकता हुई। उसने शिवलिंग एक ग्वाले बालक को पकड़ाया, परंतु वह अधिक समय तक उसे धारण नहीं कर सका और भूमि पर रख दिया।
जब रावण वापस आया, तब उसने शिवलिंग को उठाने का बहुत प्रयास किया, परंतु वह अचल हो चुका था। भगवान शिव उसी स्थान पर ज्योतिर्लिंग रूप में स्थापित हो गए और “वैद्यनाथ” नाम से प्रसिद्ध हुए।
ऐसी मान्यता है कि श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का दर्शन और पूजा करने से रोग, दुःख, भय और मानसिक कष्ट दूर होते हैं। यह पवित्र धाम भक्तों को स्वास्थ्य, शांति और भगवान शिव की विशेष कृपा प्रदान करने वाला माना जाता है।